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17-01-2020
भूपेश बघेल ने साल के पहले मिशन संचार उपग्रह के सफल प्रक्षेपण पर दी बधाई

रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसरो (आईएसआरओ) की ओर से वर्ष 2020 के पहले मिशन संचार उपग्रह जीसैट-30 के सफलता पूर्वक प्रक्षेपण पर वैज्ञानिकों और उनकी पूरी टीम को शुभकामनाएं दी है। यह सैटेलाइट टेलीविजन अपलिंकिंग, डिजिटल सैटेलाइट खबर संग्रहण (डीएसएनजी), डीटीएच सैटेलाइट टीवी प्रसारण और टेली कम्युनिकेशन के क्षेत्र में विभिन्न कार्य करेगी। संचार उपग्रह जीसैट-30 को इसरो ने शुक्रवार सुबह 2.35 बजे फ्रेंच गुआना के कौरू स्थित स्पेस सेन्टर युरोपियन रॉकेट एरियन 5-वीटी 252 से लॉन्च किया।

17-01-2020
इसरो ने लॉन्च किया संचार उपग्रह जीसैट-30, इतने साल तक करेगा काम

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नाम एक और कामयाबी जुड़ गई है। इसरो ने शुक्रवार को सुबह करीब दो बजकर 35 मिनट पर संचार उपग्रह जी-सैट 30 का प्रक्षेपण यूरोपीयन स्पेस एजेंसी एरियनस्पेस के फ्रेंच के गुआना में एरियन-5 व्हीकल से सफलतापूर्वक कर दिया। इसके थोड़ी देर बाद यह व्हीकल से अलग हो गया और अपनी कक्षा की ओर बढ़ गया। ये सैटेलाइट इनसैट-4ए की जगह लेगा। जीसैट-30 का वजन करीब 3,357 किलोग्राम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण के बाद कु-बैंड और सी-बैंड कवरेज में बढ़ोतरी होगी।

इससे भारतीय क्षेत्र और द्वीपों के साथ बड़ी संख्या में खाड़ी और एशियाई देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया में पहुंच बढ़ेगी। जीसैट-30 संचार सैटेलाइट है जो 15 साल के मिशन के लिए प्रक्षेपित किया गया है। इसरो ने इस सैटेलाइट को 1-3केबस मॉडल में तैयार किया है, जो जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के सी और कु-बैंड से संचार सेवाओं में मदद करेगा। इसरो के अनुसार इस सैटेलाइट की मदद से टेलीपोर्ट सेवा, डिजिटल सैटेलाइट न्यूज गैदरिंग, डीटीएच टेलिविजन सेवा, मोबाइल सेवा कनेक्टिविटी जैसे कई सुविधाओं को बेहतर करने में मदद मिलेगी। कु-बैंड सिग्नल से पृथ्वी पर चल रही गतिविधियों को पकड़ा जा सकता है।

02-01-2020
इसरो प्रमुख ने किया एलान, गगनयान प्रोजेक्ट के लिए चयनित चार अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग होगी रूस में

नई दिल्ली। इंडियन स्पेस रिसर्च सेंटर यानी इसरो ने साल के पहले ही दिन तीन बड़ी घोषणाएं कर दीं। इसरो चीफ के सिवन ने प्रेस कॉन्फेंस कर चंद्रयान-3, गगनयान प्रोजेक्ट और नए स्पेस पोर्ट के बारे में जानकारियां दी। सिवन ने बताया, केंद्र सरकार ने चंद्रयान-3 को मंजूरी दे दी है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि इसरो ने गगनयान के लिए अंतरिक्ष यात्रियों का भी चयन कर लिया है। उन्होंने बताया, "हमनें गगनयान प्रोजेक्ट पर काफी प्रगति की है और काफी काम हो भी चुका है। इसके लिए अंतरिक्ष यात्रियों की चयन प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है। गगनयान प्रोजेक्ट के लिए चार अंतरिक्ष यात्रियों का चयन किया है। उनकी ट्रेनिंग भी पूरी हो चुकी है और आगे की ट्रेनिंग जनवरी के तीसरे हफ्ते से रूस में शुरू होगी।" बता दें कि, भारत ने गगनयान मिशन पर सहयोग के लिए रूस और फ्रांस के साथ करार किया है। इसके साथ ही के सिवन ने खुशी जताते हुए बताया, "चंद्रयान-3 को केंद्र सरकार से मंजूरी मिल गई है और इसकी सभी प्रक्रिया सही से चल रही हैं।'' इसरो प्रमुख ने कहा, ''चंद्रयान-3 का पैटर्न चंद्रयान-2 की ही तरह है। चंद्रयान-2 में ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर प्रारूप था। इन सब का पहले ही इस्तेमाल हो चुका है।'' इसके अलावा के सिवन ने एक और स्पेस पोर्ट खोले जाने के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, ''दूसरे स्पेस पोर्ट के लिए भूमि अधिग्रहण हो चुका है। ये स्पेस पोर्ट तमिलनाडू के तूतीकोरेन जिले में होगा।'' आपको बता दें कि इससे पहले देश में एक मात्र स्पेस पोर्ट था, जो कि आंध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित है। वहीं अब दूसरा स्पेस पोर्ट तमिलनाडू के तूतीकोरेन में जल्द खुलने जा रहा है।

23-12-2019
काजू बेचकर चलाती थी घर, अब जाएगी नासा, कुछ ऐसी है जयलक्ष्मी की कहानी  

नई दिल्ली।कहते है अगर आप कुछ करने की ठान लो तो आप उससे पूरा कर सकते हो। कुछ ऐसी ही कहानी है काजू बेचकर घर चलाने वाली के. जयलक्ष्मी की जो अब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा जाने का अपना सपना पूरा कर पाएगी। एक ऑनलाइन परीक्षा में नासा जाने का मौका जीतने वाली जयलक्ष्मी का सपना पूरा करने के लिए लोगों ने चंदे के जरिये टिकट का पैसा जुटा दिया है। उसे मई, 2020 में नासा जाना है। इतना ही नहीं अब उसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में भी जाने का मौका मिलेगा। अदानाकोट्टई के सरकारी स्कूल की कक्षा 11 में विज्ञान की छात्रा जयलक्ष्मी को नासा जाने के लिए चल रहे ऑनलाइन परीक्षा की जानकारी मिलने की कहानी भी अपने आप में अनोखी है। जयलक्ष्मी के मुताबिक, मैं एक कैरम मैच का अभ्यास कर रही थी। इसी दौरान सामने बोर्ड पर समाचार पत्र से काटकर लगाई गई खबर में धान्य थासनेम की स्टोरी पढ़ी। थासनेम ने पिछले साल नासा जाने का मौका जीता था। मुझे इससे बेहद प्रेरणा मिली और मैंने तत्काल इस ऑनलाइन परीक्षा के लिए अपना पंजीकरण करा लिया। लेकिन जयलक्ष्मी अंग्रेजी नहीं जानती थी। उसने करीब एक महीने तक रात-दिन अंग्रेजी का अभ्यास किया और परीक्षा में ग्रेड-2 लाकर नासा जाने का मौका जीत लिया।

जयलक्ष्मी को नासा जाने का मौका तो मिल गया, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी, उसके लिए 1.69 लाख रुपये की रकम जुटाना। यह रकम उसे 27 दिसंबर तक जमा करानी थी। जयलक्ष्मी ने सोशल मीडिया के जरिये इसके लिए अपील की और पुदुकोटै की जिलाधिकारी पी. उमा माहेश्वरी को मिलकर उनसे भी मदद की गुहार लगाई। जयलक्ष्मी के मुताबिक, मेरे पिता परिवार से अलग रहते हैं और कभी-कभी ही पैसा भेजते हैं। मेरे शिक्षकों और साथी छात्रों ने पासपोर्ट के लिए रकम जमा की। पासपोर्ट अधिकारी ने भी 500 रुपये की मदद की।

इसके बाद जिलाधिकारी के आग्रह पर ओएनजीसी के कर्मचारियों ने अपने वेतन से 65 हजार रुपये का चंदा उसके लिए जमा किया। सोशल मीडिया पर की गई अपील के जरिये भी लोग उसकी मदद के लिए आगे आए और आखिरकार वह पूरा पैसा जुटाने में सफल हो ही गई। जयलक्ष्मी को एक और खुशखबरी तब मिली, जब इसरो के पूर्व वैज्ञानिक व पद्मश्री से सम्मानित एम. अन्नादुरई ने उसे इसरो का दौरा कराने का वादा किया, जहां वह वैज्ञानिकों से मिलकर रॉकेट के उड़ने की प्रक्रिया की जानकारी ले सकेगी।

घर में नहीं बिजली, पढ़ाती है ट्यूशन

जयलक्ष्मी का घर पिछले साल तमिलनाडु में आए गाजा चक्रवात का शिकार हो गया था और तब से उसके घर में बिजली नहीं है। इतना ही नहीं वह अपने परिवार की इकलौती कमाने वाली सदस्य है। वह काजू बेचने के अलावा कक्षा आठ और नौ के बच्चों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई और घर का खर्च पूरा करती है। साथ ही अपनी मां और मानसिक रूप से दिव्यांग छोटे भाई का इलाज भी कराती है।

बनाना चाहती हैं अब्दुल कलाम की तरह रॉकेट

जयलक्ष्मी का सपना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की तरह वैज्ञानिक बनकर रॉकेट बनाने का है। मिसाइल मैन कलाम को अपना आदर्श मानने वाली जयलक्ष्मी को लगता है कि उसकी सफलता से अन्य सरकारी स्कूलों के बच्चों को भी प्रेरणा मिलेगी। 

09-12-2019
सीधे इंटरव्यू के जरिये पाए इसरो में नौकरी, ऐसे करें आवेदन

रायपुर। केंद्र सरकार अपने अंतरिक्ष विभाग के तहत सैकड़ों पदों पर सरकारी नौकरी देने जा रही है। केंद्र सरकार की ये नौकरियां भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के प्रोपलशन कॉम्प्लेक्स के लिए दी जा रही है। आईटीआई्, डिप्लोमा व डिग्री होल्डर इन नौकरियों के लिए अप्लाई कर सकते हैं। किसी अनुभव की जरूरत नहीं है। आयुसीमा भी 35 वर्ष तक है। केंद्र सरकार की इस भर्ती की खास बात यह है कि इसके लिए कोई परीक्षा नहीं देनी है सीधे इंटरव्यू के जरिए अभ्यर्थियों का चयन होगा। उक्त उल्लेखित विषयों की परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर चयन होगा। यानी आईटीआई, इंजीनियरिंग व डिप्लोमा में जिसके जितने अधिक मार्क होंगे उनका सिलेक्शन पक्का।

इसरो की इस भर्ती में तीन पद इंजीनियरिंग के अलावा आर्ट, साइंस व कॉमर्स में ग्रेजुएट कर चुके अभ्यर्थियों के लिए भी रिक्त हैं। सभी को अलग-अलग तारीखों में तय स्थान पर पहुंचकर इंटरव्यू देने होंगे। कुल 220 पद रिक्त हैं।

रिक्त पदों की संख्या

इंजीनियरिंग ग्रेजुएट-38

आर्ट/साइंस/कॉमर्स- 03

डिप्लोमा होल्डर- 59

 आईटीआई-120

इंटरव्यू की तिथियां

इंजीनियंरिंग ग्रेजुएट-14-12-2019

टेक्नीशियन (डिप्लोमा होल्डर)-21-12-2019

आईटीआई-1-4-2019

दो पालियों में इंटरव्यू

इन तारीखों पर इंटरव्यू दो पालियों में संपन्न होंगे। पहली पाली 9 बजे से शुरू होगी तो दूसरी दोपहर 1:30 बजे से। अभ्यर्थियों को निर्धारित प्रारूप में आवेदन भरकर अपने संपूर्ण ओरिजनल दस्तावेजों के साथ इंटरव्यू के लिए पहुंचना होगा।डाक कुरियर व अन्य माध्यमों से भेजे गए आवेदन स्वीकार नहीं होंगे। अपने साथ आईडी प्रूफ रखना अनिवार्य है।

आयुसीमा-35 वर्ष, नियमानुसार छूट का प्रावधान।

इंटरव्यू का स्थान- तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में महेंद्रगिरी स्थित इसरो के प्रोपलशन कॉम्प्लेक्स

केंद्र सरकार की अप्रेंटिस आधार पर इस भर्ती का संपूर्ण विवरण प्राप्त करने के लिए क्लिक करें  Link 

आवेदन का प्रारूप प्राप्त करें

 

29-11-2019
20 साल में 300 विदेशी सैटेलाइट्स लॉन्च कर इसरो ने बनाया नया कीर्तिमान

नई दिल्ली। भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (इसरो) ने दो महीने पहले चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर विक्रम को लैंड करने की कोशिश की, जिसमें उसे बेशक सफलता नहीं मिली लेकिन बुधवार को अंतरिक्ष एजेंसी ने एक नया कीर्तिमान रच दिया। एजेंसी ने पीएसएलवी-सी47 के जरिए अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट कार्टोसैट-3 के साथ अमेरिकी की 13 नैनोसैटेलाइट को सफलतापूर्व लॉन्च किया। दो दशकों में 33 देशों के 300 से ज्यादा सैटेलाइट्स को लॉन्च करना इसरो के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की टीम को बधाई देते हुए ट्वीट किया, 'मैं इसरो टीम को पीएसएलवी-सी 47 द्वारा स्वदेशी कार्टोसैट-3 उपग्रह और संयुक्त राज्य अमेरिका के एक दर्जन से अधिक नैनो उपग्रहों के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण के लिए बधाई देता हूं। कार्टोसैट-3 हमारी हाई रिज्योलूशन इमेजिन क्षमता को बढ़ाएगा। इसरो ने एक बार फिर देश को गौरवान्वित किया है।'

बता दें कि बुधवार को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रॉकेट लॉन्च होने के 17 मिनट बाद कार्टोसैट-3 को सफलतापूर्वक 509 किलोमीटर में अतंरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया। अगले 10 मिनट बाद उसने अमेरिका के 13 नैनो उपग्रहों को उनकी संबंधित कक्षाओं में स्थापित किया। यह दुश्मन की हर गतिविधि पर पैनी नजर रखेगा। 1,625 किलोग्राम का कार्टोसैट-3 हाई रिजॉल्यूशन इमेजिंग क्षमता वाली तीसरी पीढ़ी के अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट का पहला और कार्टोसैट श्रृंखला का नौवां उपग्रह है। लॉन्चिंग के बाद इसरो अध्यक्ष के सिवन ने कहा, 'कार्टोसैट-3 इसरो द्वारा अब तक विकसित सबसे जटिल और उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है।' इसकी आयु पांच वर्ष होगी।

इससे पहले इसरो ने 22 मई को सर्विलांस सैटेलाइट रीसैट-2बी और एक अप्रैल को एमिसैट (इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सैटेलाइट) को लॉन्च किया था। एमिसैट डीआरडीओ की दुश्मनों के रडार पर नजर रखने में मदद करता है। सूत्रों के अनुसार, इस सैटेलाइट का प्रयोग खुफिया जानकारी जुटाने और सीमा पर चौकसी बनाने के लिए किया जाएगा। कहा जाता है कि पाकिस्तान में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के लिए कार्टोसैट-1 और 2 उपग्रहों से खुफिया जानकारी जुटाई गई थी। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। कार्टोसैट उपग्रह से किसी भी मौसम में धरती की तस्वीरें ली जा सकती हैं। इसके जरिए आसमान से दिन और रात दोनों समय जमीन से एक फीट की ऊंचाई तक की साफ तस्वीरें ली जा सकती हैं।

 

14-11-2019
2020 में एक बार फिर चांद पर जाएगा भारत, इसरो ने शुरू किया कार्य

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) सितंबर 2019 में पहली बार में चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करने में असफल रहा। अब जल्द ही इसरो चंद्रयान 3 को चंद्रमा की तरफ रवाना कर सकता है। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए नवंबर 2020 तक की समयसीमा तय की गई है। इसरो ने कई समितियां बनाई हैं। इसके लिए इसरो ने पैनल के साथ तीन सब समितियों की अक्टूबर से लेकर अब तक तीन उच्च स्तरीय बैठक हो चुकी है। इस नए मिशन में केवल लैंडर और रोवर शामिल होगा क्योंकि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर ठीक तरह से कार्य कर रहा है। बीते दिनों ओवरव्यू (समीक्षा) कमिटी की बैठक हुई। जिसमें विभिन्न सब समितियों की सिफारिशों पर चर्चा की गई। समितियों ने संचालन शक्ति, सेंसर, इंजिनियरिंग और नेविगेशन को लेकर अपने प्रस्ताव दिए हैं।

एक वैज्ञानिक ने कहा कि कार्य तेज गति से चल रहा है। इसरो ने अब तक 10 महत्वपूर्ण बिंदुओं का खाका खींच लिया है। जिसमें लैंडिंग साइट, नेविगेशन और लोकल नेविगेशन शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि पांच अक्टूबर को एक आधिकारिक नोटिस जारी किया गया है। इस नोटिस में कहा गया है, 'यह जरूरी है कि चंद्रयान-2 की विशेषज्ञ समिति द्वारा लैंडर सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए की गई सिफारिशों पर ध्यान दिया जाए। जिन सिफारिशों को चंद्रयान-2 के एडवांस फ्लाइट प्रिपरेशन की वजह से लागू नहीं किया गया था।' दूसरे वैज्ञानिक ने कहा कि नए मिशन की प्राथमिकता लैंडर के लेग्स को मजबूत करना है। ताकि वह चांद की सतह पर तेज गति से उतरने पर क्रैश न हो। सूत्रों का कहना है कि इसरो एक नया लैंडर और रोवर बना रहा है। लैंडर पर पेलोड की संख्या को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। बात दें कि सितंबर में इसरो ने चंद्रयान-2 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने की कोशिश की थी जिसमें उसे सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि ऑर्बिटर ठीक तरह से काम कर रहा है और वैज्ञानिकों का कहना है कि वह सात सालों तक अपना काम करता रहेगा।

 

23-10-2019
चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम की लोकेशन ढूंढने में नासा फिर हुआ नाकाम

नई दिल्ली। चंद्रमा की सतह पर गायब हुआ चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का लोकेशन ढूंढने में नासा फिर असफल हुआ है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने बताया कि लूनर रिकॉर्नेशन ऑर्बिटर (एलआरओ) को चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का कोई सबूत नहीं मिला है। बता दें कि सात सितंबर को चंद्रमा पर साफ्ट लैंडिंग के दौरान इसरो का लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया था। एलआरओ मिशन के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट नोआ एडवर्ड पेट्रो ने बताया कि लूनर रिकॉर्नेशन ऑर्बिटर ने 14 अक्टूबर को चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के लैंडिंग साइट के क्षेत्र में प्रवेश किया था लेकिन उसे लैंडर का कोई भी सबूत नहीं मिला।

नासा की टीम ने चेंज डिटेक्शन तकनीक के द्वारा एलआरओ के तस्वीरों की सावधानीपूर्वक जांच की और विक्रम का पता लगाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि इसका उपयोग चंद्रमा पर नए उल्कापिंड के प्रभाव को खोजने के लिए किया जाता है। एलआरओ मिशन के उप परियोजना वैज्ञानिक जॉन केलर ने आशंका जताई कि यह संभव है कि विक्रम किसी गढ्ढे की छाया में या खोज क्षेत्र के बाहर स्थित हो। कम अक्षांश के कारण लगभग 70 डिग्री दक्षिण में स्थित इस क्षेत्र के कई हिस्से गहरे अंधकार में भी हैं। बता दें कि इससे पहले भी एलआरओ ने 17 सितंबर को विक्रम के लैंडिंग साइट के उपर से उड़ते हुए कई हाई रिजॉल्यूशन फोटोज को लिया था, लेकिन उसमें भी विक्रम का कोई पता नहीं चल सका था।

05-10-2019
विक्रम में आ सकती है जान, आज से शुरू होगी संपर्क साधने की कोशिश

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 इसरो के लिए एक बहुत बड़ा सपना था जो पूरा होते-होते अंत में टूट गया, लेकिन इसरो फिर से अपने उस टूटे सपने को पूरा करने की कोशिश में लग गया है। दरअसल इसरो ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर के हाई रिजोल्यूशन कैमरे से चांद की खींची तस्वीरें जारी की है। इस हाई रिजोल्यूशन कैमरे ने चंद्रमा के सतह की तस्वीर भेजी है। इस तस्वीर में चंद्रमा के सतह पर बड़े और छोटे गड्ढे नजर आ रहे हैं। इसरो ने कहा, आर्बिटर में मौजूद आठ पेलोड ने चांद की सतह पर मौजूद तत्वों को लेकर कई सूचनाएं भेजी हैं। आर्बिटर चांद की सतह पर मौजूद आवेशित कणों का पता लगा रहा है। ऑर्बिटर के पेलोड क्लास ने अपनी जांच में चांद की मिट्टी में मौजूद कणों के बारे में पता लगाया है। यह तब संभव हुआ है, जब सूरज की तेज रोशनी में मौजूद एक्स किरणों की वजह से चांद की सतह चमक उठी।

 आज से चांद पर होगा दिन, सौर पैनलों से विक्रम में आ सकती है जान

चांद की अंधेरी सतह पर बेसुध पड़े चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम को लेकर फिर उम्मीद जगी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अपने सौर पैनलों की मदद से विक्रम फिर काम शुरू कर सकता है। दरअसल, चांद पर शनिवार से दिन की शुरुआत हो रही है। ऐसे में विक्रम को लेकर कोई अच्छी खबर आने की उम्मीद बढ़ गई है। वहीं, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने कहा है कि चांद के आसमान में चक्कर लगा रहा चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर सोडियम, कैल्शियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, टाइटेनियम और लोहे जैसे महत्वपूर्ण खनिज तत्वों का पता लगाने के लिए काम कर रहा है। इसरो के मुताबिक, ऑर्बिटर का पेलोड अपने तय मकसद के लिए बेहतर तरीके से काम कर रहा है। वहीं, विक्रम की तलाश और उससे संपर्क करने की कोशिशों में जुटी अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि अब तक विक्रम से कोई आंकड़ा नहीं मिला है। खगोलविद् स्कॉट टायली ने ट्वीट कर विक्रम से संपर्क की प्रबल संभावना जताई है। उन्होंने कहा है कि विक्रम को खोजने में कामयाबी जरूर मिलेगी। बताया जा रहा है कि दिन होने के साथ ही विक्रम से संपर्क करने की कोशिशें तेज होंगी।

इसरो के एक वैज्ञानिक ने बताया कि हालांकि अब विक्रम से संपर्क करना बेहद मुश्किल होगा, लेकिन कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। उनसे जब यह पूछा गया कि क्या चांद पर रात के समय बहुत ज्यादा ठंड में विक्रम सही सलामत रह सकता है, तो उन्होंने कहा, सिर्फ ठंड ही नहीं, बल्कि झटके से हुआ असर भी चिंता की बात है। हार्ड लैंडिंग के चलते विक्रम तेज गति से चांद की सतह पर गिरा होगा। इस झटके के चलते विक्रम के भीतर मौजूद उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है। चांद के चक्कर लगा रहे नासा के लुनर रिकॉनिएसेंस ऑर्बिटर ने जो तस्वीरें भेजी थीं, चांद पर रात होने के चलते उससे तस्वीरें साफ नहीं आ पाई थीं।

22-09-2019
इसरो अब अंतरिक्ष में भेजेगा गगनयान, महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर कर रहा दिन रात काम 

नई दिल्ली। चंद्रयान 2 के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट गगनयान पर दिन रात काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत अगले साल दिसंबर में पहली और उसके बाद जुलाई 2021 में दूसरी बार मानवरहित स्पेस फ्लाइट अंतरिक्ष में भेजी जाएगी। इसरो प्रमुख डॉ के. सिवन ने बताया कि इसके बाद तीसरी और आखिरी फ्लाइट दिसंबर 2021 में इंसान को लेकर अंतरिक्ष में रवाना होगी, जो अंतरिक्ष में भारत का पहला मानव मिशन होगा, जिसे स्वदेशी रॉकेट के द्वारा लॉन्च किया जाएगा।
सिवन ने बताया कि गगनयान भारत के लिए बेहद जरूरी प्रोजेक्ट है क्योंकि यह मिशन देश की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की क्षमता को बढ़ाएगा। इससे विज्ञान के क्षेत्र में देश की ताकत में इजाफा होगा। इससे पहले सिवन ने चंद्रयान-2 की जानकारी देते हुए कहा था कि हमारी अगली प्राथमिकता गगनयान मिशन है। 
गौरतलब है कि इसी साल मई में, वायुसेना ने इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के साथ गगनयान मिशन के लिए क्रू सिलेक्शन और ट्रेनिंग उपलब्ध कराने का समझौता किया था। इसके तहत, दिसंबर 2021 में गगनयान से तीन सदस्यीय वैज्ञानिकों का एक दल भेजा जाना है, जो कम से कम सात दिन अंतरिक्ष में गुजारेगा। इस यान को जीएसएलवी मार्क-3 से अंतरिक्ष में लॉन्च किया जाएगा। आखिरी के तीन अंतरिक्ष यात्रियों का चयन वायुसेना और इसरो दोनों साथ मिलकर कर रहे हैं। इन चयनित टेस्ट पायलटों को प्रशिक्षण के लिए रूस भेजा जाएगा। इसके लिए इसरो ने रूस की अंतरिक्ष एजेंसी ग्लावकॉस्मोस के साथ इसी साल 2 जुलाई को एक समझौता किया था।

13-09-2019
इसरो वैज्ञानिक ने बताये लैंडिंग बिगड़ने के तीन बड़े कारण

नई दिल्ली। भले ही चंद्रयान-2 मिशन में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को एक झटका लगा हो, उसका विक्रम लैंडर से संपर्क टूट गया हो। लेकिन इसरो वैज्ञानिक अब भी विक्रम से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। अब तो इसरो के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी इसरो की मदद कर रही है। लेकिन इस बीच इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के पूर्व निदेशक और आईआईटी खड़गपुर के एडजंक्ट प्रोफेसर तपन मिश्रा ने बताया कि इस मिशन के बिगड़ने के तीन बड़े कारण क्या हो सकते हैं। प्रोफेसर तपन मिश्रा ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर चरणबद्ध तरीके से समझाया कि कैसे लैंडिंग में गड़बड़ी आई होगी और कहां ध्यान देने की जरूरत थी।

आइएअब जानते हैं कि प्रो. तपन मिश्रा ने तीन बड़े कारण क्या बताए

1. थ्रस्टर्स सही समय पर एकसाथ न स्टार्ट हुए हों

विक्रम लैंडर चांद की सतह से 30 किमी की ऊंचाई पर 1.66 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से चक्कर लगा रहा था। जब उसे चांद की सतह पर उतारना था तब विक्रम लैंडर को सीधा रहना था और उसकी गति 2 मीटर प्रति सेकंड होनी चाहिए थी। विक्रम लैंडर में पांच बड़े थ्रस्टर्स हैं. जो उसे लैंडिंग में मदद करते। इन्ही थ्रस्टर्स की मदद से विक्रम लैंडर ने चांद के चारों तरफ चक्कर भी लगाए थे। इनके अलावा विक्रम लैंडर पर 8 छोटे थ्रस्टर्स और हैं। थ्रस्टर्स छोटे रॉकेट जैसे होते हैं जो किसी वस्तु आगे या पीछे बढ़ाने में मदद करते हैं।


1 साल के लिए गया था चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर, जानिए कैसे 7 साल तक करता रहेगा काम

पांच बड़े थ्रस्टर्स विक्रम के नीचे लगे थे। चार थ्रस्टर्स चार कोनों में और एक बीच में. ये विक्रम को ऊपर-नीचे ले जाने में मदद करते। जबकि, 8 छोटे थ्रस्टर्स विक्रम की दिशा निर्धारण में मदद करते। ये हो सकता है कि चांद की सतह से 400 मीटर की ऊंचाई पर लैंडिंग के समय सभी बड़े थ्रस्टर्स में एकसाथ ईंधन न पहुंचा हो। इससे ये हुआ होगा कि सारे थ्रस्टर्स एकसाथ स्टार्ट न हुए हों। नतीजा ये कि लैंडर तेजी से घूमने लगा होगा और संतुलन खो दिया होगा। इस समय लैंडर वैसे ही घूम रहा होगा जैसी दिवाली में चकरी आतिशबाजी घूमती है।

2. सही समय और सही मात्रा में ईंधन इंजन तक न पहुंचा हो

विक्रम लैंडर का बड़ा हिस्सा ईंधन की टंकी है। लैंडर की तेज गति, ब्रेकिंग की वजह से ईंधन अपनी टंकी में वैसे ही उछल रहा होगा जैसे पानी के टब में पानी उछलता है। इससे इंजन के नॉजल में ईंधन सही से नहीं पहुंचा होगा। इसकी वजह से लैंडिंग के समय थ्रस्टर्स को पूरा ईंधन न मिलने से लैंडिंग में गड़बड़ी आ सकती है। 30 किमी की ऊंचाई से 400 मीटर की ऊंचाई तक आने में विक्रम लैंडर की गति 1.66 किमी/सेकंड (6000 किमी/घंटा) और 60 मीटर/सेकंड (200 किमी/घंटा) हो गई थी। लैंडर कि दिशा भी हॉरिजोंटल से वर्टिकल हो चुकी थी। इस पूरे समय कोनों पर मौजूद चार थ्रस्टर्स काम कर रहे थे जबकि बीच वाला थ्रस्टर बंद था। 400 मीटर की ऊंचाई पर लैंडर की दिशा वर्टिकल हो गई। नीचे के चार थ्रस्टर्स में से दो बंद कर अगल-बगल लगे दो छोटे थ्रस्टर्स को ऑन किया गया ताकि नीचे आने के साथ-साथ विक्रम हेलीकॉप्टर की तरह मंडरा सके और लैंडिंग के लिए सही जगह खोज सके। लेकिन यहीं कहीं पर किसी थ्रस्टर ने विक्रम का साथ नहीं दिया। ऐसा इसलिए हुआ होगा कि ईंधन सही तरीके से एकसाथ सभी काम करने वाले थ्रस्टर्स तक न पहुंचा हो।

3. चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से लड़ न पाया हो विक्रम

चांद की सतह से 100 मीटर की ऊंचाई पर विक्रम लैंडर हेलीकॉप्टर की तरह मंडराता। चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को बर्दाश्त करने के लिए अगल-बगल के छोटे थ्रस्टर्स ऑन रहते। लैंडर का कैमरा लैंडिंग वाली जगह खोजता और फिर उतरता। कैमरे से ली गई तस्वीर ऑनबोर्ड कंम्प्यूटर में स्टोर की गई तस्वीर से मैच करती। इसके बाद विक्रम लैंडर मंडराना बंद कर धीरे-धीरे चार बड़े थ्रस्टर्स को बंद कर बीच वाले पांचवें थ्रस्टर की मदद से नीचे उतरता। इस वक्त विक्रम लैंडर में लगा रडार अल्टीमीटर लैंडर की ऊंचाई का ख्याल रखता। चुंकि लैंडिंग पूरी तरह से ऑटोमैटिक थी, इसपर पृथ्वी से कंट्रोल नहीं किया जा सकता था। यहीं पर गुरुत्वाकर्षण को विक्रम लैंडर भांप नहीं पाया होगा, क्योंकि वहां गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में बदलाव आता रहता है।

12-09-2019
विक्रम लैंडर से संपर्क स्थापित करने नासा ने भेजा हैलो संदेश

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) चांद की सतह पर पड़े लैंडर विक्रम से दोबारा संपर्क साधने की कोशिश कर रहा है। सात सितंबर को हार्ड लैंडिंग के बाद इसरो का इससे संपर्क टूट गया था। यदि विक्रम से इसरो का संपर्क स्थापित हो जाता है तो लैंडर और रोवर अपना काम शुरू कर देंगे और भारत के इस अंतरिक्ष अभियान 100 प्रतिशत सफलता मिल जाएगी। फिलहाल यह मिशन 95 प्रतिशत सफल है। इसी बीच दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) ने चांद की सतह पर गतिहीन पड़े विक्रम लैंडर से संपर्क स्थापित करने के लिए उसे हैलो का संदेश भेजा है। अपने गहरे अंतरिक्ष ग्राउंड स्टेशन नेटवर्क के जरिए नासा का जेट प्रोपल्सन लैबोरेटरी (जेपीएल) ने लैंडर के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए विक्रम को एक रेडियो फ्रीक्वेंसी भेजी है। नासा के एक सूत्र ने इस बात की पुष्टि की। सूत्र ने कहा कि हां नासा/जेपीएल विक्रम से गहरे अंतरिक्ष नेटवर्क (डीप स्पेस नेटवर्क- डीएसएन) के जरिए संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। जिसके लिए इसरो सहमत है। विक्रम से संपर्क स्थापित करने की उम्मीदें दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। 14 पृथ्वी दिवस के बाद 20-21 सितंबर को जब चंद्रमा पर रात होगी तब विक्रम से दोबारा संपर्क स्थापित करने की सारी उम्मीदें खत्म हो जाएंगी। एक अन्य अंतरिक्षयात्री स्कॉट टिल्ले ने भी इस बात की पुष्टि की है कि नासा के कैलिफोर्निया स्थित डीएसएन स्टेशन ने लैंडर को रेडियो फ्रीक्वेंसी भेजी है। टिल्ले उस समय चर्चा में आए थे जब उन्होंने 2005 में गुम हुए नासा के एक जासूसी उपग्रह का पता लगाया था। लैंडर को सिग्नल भेजने पर चांद रेडियो रिफ्लेक्टर के तौर पर कार्य करता है और उस सिग्नल के एक छोटे से हिस्से को वापस धरती पर भेजता है जिसे कि 8,00,000 किलोमीटर की यात्रा के बाद डिटेक्ट किया जा सकता है। बुधवार को इसरो ने बताया था कि उसका लैंडर विक्रम से संपर्क चंद्र सतह से 2.1 किलोमीटर की ऊंचाई पर नहीं बल्कि 335 मीटर पर टूटा था। इसरो के मिशन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स से जारी तस्वीर से इस बात का खुलासा हुआ है। चंद्रमा की सतह से 4.2 किलोमीटर की ऊंचाई पर भी विक्रम लैंडर अपने पूर्व निर्धारित पथ से थोड़ा भटका लेकिन जल्द ही उसे सही कर दिया गया। इसके बाद जब चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर चंद्र सतह से  2.1 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचा तो वह अपने पथ से भटक कर दूसरे रास्ते पर चलने लगा।

 

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